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मोतीकण

मोतीकण ..........

पुज्यनिय आचार्य गोंडीयन धर्मगुरु मोतीरावणजी कंगाली सर की याद में ...........

प्रिय नवयुवक गोंडीयन सगाजनों आप सभी को ति. अवचितराव सयाम का सप्रेम जय सेवा .

आइए
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" कोळा सोपे कियाना "
      (गोद सोपना )
इस मह्त्वपूर्ण गोंडीयन विवाह रश्म को समझने का प्रयास करते है .
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गोंडीयन विवाह के "चिखला मांदी "कार्यक्रम के पश्चात, दुलहन के माता पिता दुलहा के माता पिता को मंडप के निचे सतरंजी पर बैठाते है ,और उनको चावल के अक्षितों का टिका लगाकर नमस्कार करते है .

दुलहन के पिता अपने दामाद को और माता अपनी कन्या को पकडकर दोनों को दुलहा के माता - पिता की गोद में बिठा देते है .

दुलहा को उसकी पिता की गोद में और दुलहन को उसकी सास की गोद में बिठाया जाता है .

उस वक्त दुलहन के माता पिता उनको ,
" आज से हमारी कन्या आपके कुल की ' कोळयार' बन गई "

उसकी हिफाजत करना आपका कर्तव्य है .
ऐसा कहते है .

"कोळयार "इस शब्द का अर्थ ही "कोळा ते वाये" अर्थात "गोद में आने वाली कन्या" ऐसा होता है .

तत्पश्चात दुलहन के माता पिता मंडप उतारने का विधी  करते है .

इस विधी के अंतर्गत विवाह मंडप के उपर जो जामुन या गुलर के डाल होते है ,उनमे से किसी एक को उठाकर पलटा कर रख दिया जाता है .

इस विधी से उस मंडप में दुसरा विवाह नही हो सकता ऐसी मान्यता है .

अंत मे दुलहन के माता पिता विदा लेकर अपने बारातीयों के साथ गांव लौट जाते है .

विवाह के समय यदी दुलहन नाबालिंग है तो उसे उसके माता पिता अपने घर ले जाते है और बालिंग होने पर उसका गौना लाकर देते है .इस नेंग को " बोरोना " कहां जाता है .

महत्वपूर्ण.......

वर्तमान में बदलते परिवेष को देखते हुए विवाह के नेंग दस्तुरों में कुछ बदलाव आ चुका है .

पुर्व काल में विवाह की प्रक्रिया पंद्रह दिनों के पुर्व से आरंभ हो जाया करती थी .

वह वर्तमान में सिमट कर मात्र तिन दिनों में आ गई है .

पुर्व काल में विवाह हेतु पाळीना या सगाई की बारात लेकर दुलहा वधु पक्ष के घर जाता था और वधु को हलदी चढाकर दुलहन बनाकर अपने साथ घर ले आता था .

"उसके मध्य काल में ऐसा परिवर्तन आ गया की वधु को अपने साथ ले आने के स्थान पर वधु के माता पिता स्वंय अपनी कन्या को हलदी चढाकर( दुलहन बनाकर )विवाह कराने हेतु वर के घर पहुचाने लगे ."

वर्तमान में उसमे तह बदलाव आ गया है की दुलहन बनाने हेतु चार लोग मिलकर पहले ही चले जाते है ,और तुरंत बाद दुलहा अपनी बारात लेकर आता है ,और वधु के घर से शादी लगाकर ले जाता है .

परंतु यह अधुरी शादी होती है

 इसलिये अपने घर के मंडप मे
 जाकर वर -वधु को पुन्हा पांच फेरे लेना होता है तब जाकर वधु अपने कुल की वधु बनती है .

"बदलाव चाहे कुछ भी हुआ ,हो रहा हो ,किंतु जो मुल दस्तुर है वे मात्र आज भी कायम है ."

तो गोंडीयन सगाजनों क्या इसी रश्म रिवाज को अपनाकर अपनी लडकियों की या लडकों की शादी विवाह करोगे ?

या हिंदु विवाह रश्म रिवाजो नुसार शादी विवाह करोगे .?

यही सभी बातें आप सभी
सुज्ञ ,
जाणकार,
अभ्यासु ,
उंची सोच रखनेवाले ,
और गोंडीयन सभ्यता की बडी बडी बाते व्हाट्सअप या फेस बुक पर शेअर करने वाले ,सभ्यता के लिये खास प्रतिक्रिया देने वाले महानुभाव को खास कर अपील करता हु की इस विश्व की पुरातन एंव मुल कोया या गोंडीयन सभ्यता को अपनाओं .

इसे बढाने हेतु अपने घर के पुनेमी या जन्म से लेकर मृत्यू तक की जो रश्म रिवाजे होती है ,उसे गोंडीयन सभ्यता नुसार ही विधीवत करों .

या आप जरुर इसे अपनाकर पुन्हा या दोबारा वही रश्म रिवाज जिंदा करोगे .

इसी बडी से बडी सोच के साथ आप सभी की ओरसे पुज्यनिय आचार्य गोंडीयन धर्मगुरु मोतीरावणजी कंगाली सर को भावभिनी आदरांजली अर्पीत करता हु .

सभी को पिला 

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