लाखों लोगों के सपने निगल गया !!!
”सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग”!
HINDI MOTIVATIONAL BLOG
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दोस्तों,
फ़िल्म तमाशा देखकर वाकई समझ् में आया
हर इंसान के दो रूप होते हैं एक उसका असली
रूप जिसको वह अकेला जानता हैं और दूसरा
रूप जो वह दुनिया को दिखाने के लिये
जीता हैं ।
पहला रूप बचपन से उत्पन्न होता हैं मतलब
पागलपन , किसी की भी परवाह नहीं , कुछ
भी कर गुजरने की जिद , नया सीखने का
साहस , अदभुत उमंग और जुनून ।
लेकिन जैसे जैसे बडा हुआ लोगों ने उस बचपन
को कुचलना शुरू किया और धीरे- धीरे
लोगों ने मेरे ऊपर अपनी सोच को थोपना
शुरू किया । और कुछ समय बाद मेरे दूसरे रूप का
उदय हुआ जो दूसरे लोगों या दुनिया की
सोच के मुताविक हैं और मेरा पहला रूप
बचपन वाला कही छुप गया ।
अब मुझे भी ज़माने ने अपनी दौड़ में शामिल
कर लिया । जिसमें मुझे केवल Doctor या
Engineer बनना था, अपने आप को भूलकर
क्योंकि अब मुझे एक भयानक रोग लग चुका
था। क्या कहेंगे लोग् ? हां एक भयानक रोग
क्या कहेंगे लोग ।
मतलब अब मैं कुछ भी करने से पहले क्या कहेंगे
लोग सोचने लगा और कई बार तो लोग क्या
सोचेंगे यह भी मैं सोंचने लगा। मतलब मैं कौन
हूँ, और क्या चाहता हूँ, क्या बनना चाहता
हूँ इसकी किसी को परवाह नहीं थी । अब
शायद मुझे भी नहीं ।
दोस्तों, हम सब के साथ भी यही होता है
,बस दूसरे क्या चाहते हैं , उनके हिसाव से
दौड़ रहे हो तो सब कुछ ठीक हैं ,और जैसे ही
आपने अपनी छमता और सपनों के हिसाब से
कदम उठाया तो लोग आपकों पागल कहने
लगते हैं और हम में से 90% लोग, लोगों के डर
से यही रुक जातें हैं। और जिंदगी यूंही कटती
चली जाती हैं।
पर याद रखो दोस्तों जिन लोगों ने भी इस
भेड़चाल से बाहर निकलकर अपनी खुद की
आवाज़ सुनी है और कुछ अलग करने का साहस
किया हैं ,उन्ही लोगों ने इतिहास रचा हैं।
याद रखें –
लाखों लोगों के सपने निगल गया – ”सबसे
बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग”!
धन्यवाद…….
”सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग”!
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दोस्तों,
फ़िल्म तमाशा देखकर वाकई समझ् में आया
हर इंसान के दो रूप होते हैं एक उसका असली
रूप जिसको वह अकेला जानता हैं और दूसरा
रूप जो वह दुनिया को दिखाने के लिये
जीता हैं ।
पहला रूप बचपन से उत्पन्न होता हैं मतलब
पागलपन , किसी की भी परवाह नहीं , कुछ
भी कर गुजरने की जिद , नया सीखने का
साहस , अदभुत उमंग और जुनून ।
लेकिन जैसे जैसे बडा हुआ लोगों ने उस बचपन
को कुचलना शुरू किया और धीरे- धीरे
लोगों ने मेरे ऊपर अपनी सोच को थोपना
शुरू किया । और कुछ समय बाद मेरे दूसरे रूप का
उदय हुआ जो दूसरे लोगों या दुनिया की
सोच के मुताविक हैं और मेरा पहला रूप
बचपन वाला कही छुप गया ।
अब मुझे भी ज़माने ने अपनी दौड़ में शामिल
कर लिया । जिसमें मुझे केवल Doctor या
Engineer बनना था, अपने आप को भूलकर
क्योंकि अब मुझे एक भयानक रोग लग चुका
था। क्या कहेंगे लोग् ? हां एक भयानक रोग
क्या कहेंगे लोग ।
मतलब अब मैं कुछ भी करने से पहले क्या कहेंगे
लोग सोचने लगा और कई बार तो लोग क्या
सोचेंगे यह भी मैं सोंचने लगा। मतलब मैं कौन
हूँ, और क्या चाहता हूँ, क्या बनना चाहता
हूँ इसकी किसी को परवाह नहीं थी । अब
शायद मुझे भी नहीं ।
दोस्तों, हम सब के साथ भी यही होता है
,बस दूसरे क्या चाहते हैं , उनके हिसाव से
दौड़ रहे हो तो सब कुछ ठीक हैं ,और जैसे ही
आपने अपनी छमता और सपनों के हिसाब से
कदम उठाया तो लोग आपकों पागल कहने
लगते हैं और हम में से 90% लोग, लोगों के डर
से यही रुक जातें हैं। और जिंदगी यूंही कटती
चली जाती हैं।
पर याद रखो दोस्तों जिन लोगों ने भी इस
भेड़चाल से बाहर निकलकर अपनी खुद की
आवाज़ सुनी है और कुछ अलग करने का साहस
किया हैं ,उन्ही लोगों ने इतिहास रचा हैं।
याद रखें –
लाखों लोगों के सपने निगल गया – ”सबसे
बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग”!
धन्यवाद…….
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